जरा
सभी अनुभव का अपना अपना अलग प्रकृति और आयु वर्ग के अनुसार एक निश्चित समय अवधि के बाद संगठन प्रक्रिया समाप्त हो कर विघटन प्रक्रिया शुरू होता है; यही जरा अवस्था है । जरा को प्रौढ़ता, परिपक्वता, बुढ़ापा, बृद्धावस्था, जिर्णावस्था आदि नाम से भी जाना जाता है ।
नाद का चक्रीय परिवर्तन और इसमें चलने वाले प्रक्रिया ही जरा का कारण है । ये माया का खेल यानि कि प्राकृतिक नियम है । भौतिक, अभौतिक सभी अनुभव का यही प्रक्रिया है । सृष्टि चक्र के निरन्तरता के लिए ये आवश्यक है । अनुभवकर्ता को छोडकर बाक़ी सभी अनुभव में जरा अवस्था आता है । जीव में तो आता ही है; वनस्पति और वस्तुओं में भी ये नियम लागु होता हैं । अनुभवकर्ता अजन्मा, अजर, अमर है । अनुभवकर्ता में समय, स्थान आदि कोई भी सीमा नहीं है । इसीलिए वो हमेशा वैसा ही है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं है, लेकिन अनुभव परिवर्तनशील है । रचना से लेकर विनाश तक परिवर्रतन होता रहता है, यही प्रक्रियाका उत्तरावस्था जरा है ।
एक वर्ग के अनुभव का संगठन पूरा होनेके बाद उसमें क्षय यानि कि विघटन होना शुरु होता है । विघटन शुरु होना ही जरा अवस्था शुरु होना है । नाद के परिवर्तनका मात्रा और आवृत्ति के आधार में वृत्ति और प्रक्रिया चलते हैं । वृत्ति और प्रक्रिया के आधार में संगठन या विधटन क्रम निर्धारित होता है । शीघ्र परिवर्तन होने वाले अनुभवों में जरावस्था जल्दी आता है और धीरे वदलनेवाले अनुभवों में जरावस्था भी धीरे आता है । जैसे कि हम “किसी युग का शुरुवात, किसी व्यवस्था का शुरुवात, इस समय में हुआ था इस समय में चरम या मध्य अवस्था हुआ और इस समय में अन्त हुआ” ये कह सकतें हैं । चल रहा या आने वाले अनुभव के सम्बन्ध में भी विज्ञान के सहायत से शुरु, मध्य और जरा अवस्था का अनुमान लगाया जा सकता है ।
दूसरा उदाहरण हम सूर्य को प्रतिदिन शुभ उदय होते देखतें हैं । उस समय मधूर होता है, दिन में प्रचण्ड होता है, और साम को शिथिल होता है । ऐसा आसपास के वातावरण में चलनेवाले प्रक्रियाओं के साथ तादात्म्यता का स्तर/माप अनुसार प्रतीत होता हैं । मनुष्य वालक, युवा और बृद्ध अवस्था में जिस प्रकार से आता है, वैसा प्रक्रिया हर अनुभव में होता है । नाद में चलने वाला परिवर्तन वृत्ति, प्रक्रिया और आसपास के वातावरण से तादात्म्य के आधार में अनुभवों को संगठन होता है । जब आसपास के वातावरण से तादात्म्य टुटने लगता है, तब संगठन प्रक्रिया भी टुट कर विघटन प्रक्रिया शुरू होने लगता है ।
जब विघटन शुरु होता है, तब वो अनुभव जरा और विनाश के ओर गति करता है । जरा अवस्था का अन्तिम पढ़ाव मृत्यु यानि कि दूसरे रुप में पूर्ण परिवर्तन होना है । जरा अवस्था शुरु होते ही वो जीव या अनुभव का शक्ति और उर्जा क्षीण होता है । इसीलिए उत्तरजीविता क्रम में जरा अवस्था कम उपयोगी मानकर उपेक्षा भी किया जा सकता है । यदि वो जरा अवस्था का अनुभव जीव है तो उसमें पाए जाने वाले संवेदनशीलता के कारण जरा अवस्था कष्टकर हो सकता है ।
मनुष्य में बुद्धि और चेतना के कारण जरावस्था के लिए आवश्यक व्यवस्था कर भी लेता है । दुर्बल जीव और निर्जीव अनुभव जरा अवस्था में उपयोगहीन और अव्यवस्थित होते हैं, यत्र तत्र विखर जाते हैं । जो सचेत और सबल है; उनको निर्बल और असक्त जीवों और वस्तुओं को उचित संरक्षण एवं आवश्यक व्यवस्थापन करना चाहिए । उद्योग, कल-कारखानाओं में जिर्ण वस्तु एवं सामग्री को पुनः उपयोग किया जा सकता है । पशुपंछी का संरक्षण गृह संचालित है । मनुष्य के लिए बृद्धाश्रम संचालित है । इन में रचनात्मक कार्य, आध्यात्मिक कार्य, सत्संग, खेलकुद, व्यायाम, मनोरंजन आदि क्रियाकलाप कर के सरल, व्यवस्थित एवं आनन्ददायक बनाया जा सकत है ।
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