साधक
कोई भी कार्य को सिद्ध या सम्पन्न करनेके लिए आवश्यक नियमोंको पालन करते हुए लगनशिलता, मेहनेत और निष्ठापूर्वक लगनेवाला व्यक्ति को साधक कहते हैं । साधक ने अपने कार्य को ही पूजा के रुपमें लेता है । साधक शब्द में ही कार्य के प्रति लगाव, निष्ठा एवं कार्य सिद्धि कि प्रयत्न छिपा हुआ होता है, लेकिन फल के अपेक्षा नहीं होता । जो भी कर्म वो निष्ठा और विश्वास के साथ करता है वो कर्म ही से उसे सन्तुष्टि और आनन्द मिलता है । आनन्दके लिए उसको फल कि प्रतिक्षा करना नहीं पडता, फिर भी अच्छे विचार और अच्छे कर्म के फल भी अच्छे ही होते है । इसीलिए एक व्यक्ति जो भी मुक्ति के लिए उचित और आवश्यक कर्म करता है उसमे साधकत्व होना आवश्यक है ।
विशेष रुपसे साधक शब्द का प्रयोग आध्यात्मिक क्षेत्र में जो साधना करतें है उन्हीं के लिए होता है । मार्ग के अनुसार किस प्रकारका साधना कितने मात्रा में करनी होती है, उसीके मुताबिक़ भी साधकका अर्थ समझा जाता है । ज्ञानमार्ग और तन्त्रमार्ग में साधक, भक्ति मार्ग में भक्त, कर्म मार्ग में कर्मयोगी भी कह सकते हैं, लेकिन साधक शब्द प्राय सभी मार्ग में ही प्रयोग में आता है ।
एक साधक के लिए उचित मार्गदर्शन देनेवाला सद्गुरू होना अति आवश्यक और महत्वपूर्ण होता है । साधक के लिए अच्छा गुरु एक पारसमणि समान होता है । उसका सम्पर्क और सानिध्य से लोहा सोना और पत्थर मणि बन जाता है । रत्नाकर जैसे डाकु भी कालीदास बन सकता है । अच्छे गुरु मिलता साधक के लिए बड़ा सौभाग्य का बात है । एक अच्छा और सच्चा गुरु पाने के लिए साधक भी सच्चा होना चाहिए ।
अच्छा और सफल साधक बनने के लिए व्यक्ति में कुछ गुण होना चाहिए । जिज्ञासा, मुक्ति के इच्छा, बुद्धि विवेक, तार्किकता, आदि गुण ज्ञानमार्ग में पूर्वशर्त जैसे ही है । सहनशीलता, अनुशासन, पवित्रता, सरग्राहिता, दृढ़ निश्चय, विनम्रता, नैतिकता, सदाचार, सत्यनिष्ठा, स्वतंत्रता, धैर्यता, समर्पण जैसे गुण के बिना भी ज्ञान के साधक कहलाने योग्य नहीं होता । स्वस्थ, आज्ञाकारी, ईमानदार, समलोचक, इन्द्रियों को नियंत्रण करनेवाला, निडर, श्रद्धालू, संचार कौशल, लेखन एवं वाचन कौशल, के साथ साथ असल श्रोता होना भी ज्ञानमार्गके साधक के लिए आवश्यक गुण हैं l उल्लिखित गुण युक्त व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त करने का योग्य होता है । जो इन सभी गुणों के साथ ज्ञान प्राप्ति के लिए तैयार रहते हैं, उन्हें ही सही साधक मना जाता हैं l
व्यक्ति में कुछ गुण जन्म सिद्ध होता हैं और ऐसे गुण स्वाभाव से सम्बंधित होतें हैं l इस प्रकार के गुणों को उजागर करके उपयोग करना चाहिए l अन्य ज्ञान, सिप एवं क्षमता संबंधी गुणोंको प्रशिक्षण एवं अभ्यास के द्वारा विकास किया जा सकता हैं l गुरु आज्ञा का पालन करना, मार्ग के नियमों को अवलम्बन करना और आवश्यक गुणों के विकास करके ज्ञान साधना के लिए तैयार रहना साधक का कर्तव्य हैं l ज्ञान, बुद्धि और गुणों का आपसी अंतरसम्बन्ध हैं l एक को विकास होते ही दूसरे अपने आप विकास होता हैं l एक इमानदार, लगनशिल, समर्पित, धैर्य एवं निष्ठावान व्यक्ति ही योग्य और सफल साधक बन सकता है ।
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