निर्धनता
सामान्य अर्थ में जीवन जीने के लिए धन का अभाव होना निर्धनता है । निर्धनता सापेक्षिक शब्द है । व्यक्ति, समाज, देश के विकासस्तर अनुसार निर्धनता के अलग-अलग परिभाषा हो सकता है । किसी के लिए खाना, कपड़ा, वासस्थान जैसे न्यूनतम आधारभूत आवश्यकताओं का परिपूर्ति करना कठिन अवस्था निर्धनता है । किसी के लिए शिक्षा स्वास्थ्य और अन्य भौतिक सुविधाएँ न होना निर्धनता है, और किसी के लिए बड़े बड़े घर, महल, कल कारखाना, उद्योग व्यवसाय ना होना भी निर्धनता हो सकता है । यदि आध्यात्मिक स्तर से देखें तो न्यून बुद्धि, चेतना का न होना, सुख शांति आनंद ना होना ही निर्धनता है । धन सम्पत्ति केवल रुपये पैसे, भौतिक साधन आदि नहीं है । स्वास्थ्य ख़ुशी, सुख, मानसिक शांति, आनंद ही वास्तविक धन संपत्ति है ।
संसारिक निर्धनता के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन अज्ञानता ही सबका मूल जड है । अन्य सभी कारण अज्ञानता से ही उपजते हैं । ऐसे कुछ कारण इस प्रकार हैं-
व्यक्ति में आलसीपन, अकर्मण्यता, निष्क्रियता ।
असीमित आवश्यकताएं, लोभ लालच, मोह, आसक्ति ।
बेरोजगारी या रोजगारी का न्यून अवसर ।
समसामयिक परिवेश, पर्यावरण और घटना, परिघटना, रोग व्याधी आदि ।
न्यून आर्थिक गतिविधि, आर्थिक मंदी, न्यून आर्थिक वृद्धि ।
हिंसा, असुरक्षा, अशांति, राजनैतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार, दुराचार, अनैतिकता आदि ।
असमान वितरण, विभेद, अन्याय, अत्याचार, शोषण, दमन ।
सामाजिक विचलन विखंडन अनुसासनहीनाता, सांस्कृतिक उच्छृङ्खलता ।
आध्यात्मिक निर्धनता के लिए बेचैनी, भड़काव, सही लक्ष्य मार्ग और गुरु का ना मिलना, अस्थिर मनस्थिति, आध्यात्मिक निरक्षरता, बुद्धिहीनता, चेतना विहीनता, परंपरागत सोच विचार, मान्यताएँ, धारणाएं आदि प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं।
निर्धनता से व्यक्ति के जीवन में अनेक नकारात्मक और बुरे प्रभाव पढ़ते है । सांसारिक और आध्यात्मिक प्रगति रुक जाता है । कुछ प्रभाव इस प्रकार हैं-
न्यूनतम आधारभूत आवश्यकता पूरा न होने पर व्यक्ति को कुपोषण, दुर्बलता, अशक्तता, अनेक रोग व्याधि आदि ने घेर लेता है । व्यक्ति का जीवन कष्ट कर होता है, और असामयिक मृत्यु वरण करने के लिए विवश हो सकता है ।
परिवार और समाज में कलह, झगड़ा, वैमनस्यता, शत्रुता, व्यभिचार, हिंसा आदि बढ़ जाता है ।
व्यक्ति, परिवार, समाज, देश गरीबी के कुचक्र में फंस जाता है ।
उन्नति और विकास पीछे धकेला जाता है । व्यक्ति का ध्यान जीने में ही केन्द्रित हो जाता है । आध्यात्मिक विकास की तरफ ध्यान ही नहीं जाता, प्रगति शून्य हो जाता है । मुक्ति तो दूर अनेक जन्मों तक सांसारिक दलदल में ही भटकता रहता है ।
निर्धनता से मुक्ति पाने के लिए ज्ञान ही कड़ी है । जो मन में अज्ञान का कचरा भरा है, वो खाली होने से चेतना आ जाता है । चेतना में जो भी कार्य होंगें, सार्थक और सफल होंगें । सार्थक कार्य का अर्थपूर्ण प्रतिफल आता है । आशक्ति छूट जाने से व्यक्ति न्यूनतावादी होता है । उसके आवश्यकता सीमित होते हैं । सीमित आवश्यकता पूरा करने में अधिक कठिनाई नहीं होता । वाणी, बुद्धि, बिचार, चेतना शुद्ध हो जाता है । शुद्धिकरण से आस पास के सभी वातावरण मैत्रीपूर्ण होंगे । इससे सर्वत्र आय आर्जन, रोजगारी आदि उत्तरजीविता के आवश्यक अवसर एवं रास्ते खुलने लगेंगे और निर्धनता से सहज मुक्ति मिल जाएगा । निर्धनता हटाने का अन्य कुछ उपाय इस प्रकार हैं-
शिक्षा और स्वास्थ्य - शिक्षा और स्वास्थ्य का स्थिति सुदृढ़ होने से प्राविधिक और आर्थिक गतिविधि विस्तार होते हैं । रोजगारी के नए नए अवसर उपलब्ध होते हैं ।
आर्थिक गतिविधिओं का विस्तार- उद्योग धन्दा कलकारखाना प्रविधि आदि के विकास से वितरण प्रणाली सुदृढ होता है । सभी के लिए अवसर उपलब्ध होतें हैं ।
राजनैतिक स्थिरता - जहाँ राजनैतिक स्थिरता होता है वहाँ उत्तरजीविता के गतिविधि निर्वाध रुपसे संचालन हो पाते हैं
सामाजिक समानता और न्याय - समाजमें जब समानता और सामाजिक न्याय कायम होता है तब सभी में “बसुधैव कुटुम्वकम्” का भावना जागृत होता है । सभी में मेरा ही तत्व, मेरा ही रुप दिखाई देता है । एकत्वका भाव आ जाता है । इसी कारण जो सक्षम है वो दूसरों के उत्तरजीविता और प्रगति में समर्पित हो सकता है, सहायक बन सकता है ।
आध्यात्मिक चेतना - ध्यान और चेतना में रहने से शरीर स्वस्थ हो जाता है । सक्रियता और स्फुर्ती बढ़ जाता है, व्यक्ति उत्तरजीविता सांसारिकता और मुक्ति के जो भी कार्य करने में सक्षम हो जाता है ।
सुधारका चक्रीय प्रभाव - अस्तित्वका आधार ही चक्रीय नाद है । इसीलिए यदि एक में सुधार हो जाये तो सभी में प्रभाव शुरु होता है । व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से देश, देश से जगत में सुधार का प्रभाव पढ़ता है और सभी स्तर में समृद्धि आता है ।
उत्तरजीविता सहज होते ही व्यक्ति का ध्यान आध्यात्मिक उन्नति के तरफ बढ़ जाता है । जब आध्यात्मिक चेतना आ जाता है तब व्यक्ति, परिवार, समाज में नैतिकता, सदाचार बढ़ जाता है । भ्रष्टाचार, असमानता, अशांति, अस्थिरता दूर होते हैं । शांति, मैत्री, समानता, सुरक्षा सुदृढ होता है । प्रगति के क्षेत्र में बिना उलझन आगे बढ़ा जा सकता है । यही निर्धनता से मुक्ति का मार्ग है, यहीं से सांसारिक मुक्ति और आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग खुल जाता है । यही चक्रीय प्रभाव प्रकृतिका नियम है, नादका स्वभाव है ।
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