वैराग्य
सांसारिक माया-मोह या विषय-वासना जैसे विषयों को तुच्छ समझना या उनके प्रति आसक्ति ना होना और सांसारिक गतिविधियों से यथासंभव दूर रहना वैराग्य है । वैराग्य में सुख दुःख कि भाव पर कोई रुचि नहीं होता है । वैरागी जो भी सांसारिक और आध्यात्मिक गतिविधि है वो होने देता है । जो भी इच्छा आता है उसको आने देता है और सचेत द्रष्टा के रुपमें देखता है । यही वैराग्यका सही अर्थ है । आध्यात्मिक प्रगति के लिए वैराग्य भाव होना आवश्यक है । ये मनुष्य चित्तका उपरी परतका भाव है ।
वैराग्यका अर्थ सब कुछ त्याग करना भी नहीं है । राग या विराग का भाव सन्तुलन में रखना उचित होता है । राग विराग भी अस्तित्वका पूर्णता का ही भाग है । द्वैत में ही संसार है, माया है, और माया में राग से पूर्णतया निर्लिप्त होना सम्भव नहीं है । यहाँ तक कि आध्यात्मिक यात्रा भी आध्यात्मिक राग से ही शुरु होता है, बस अति नहीं करना है, यही साधना है। वैराग्य साधकका बहुत बड़ा और आवश्यक गुण है । सम, दम, तितिक्षा, मुमुक्षत्व जैसे गुणों को बढ़ाने से वैराग्य भी बढ़ जाएगा और वैराग्य से अन्य गुण बढ जाते है । इस प्रकार इनकेबीच पूरक सम्बन्ध है ।
स्वयंका तत्व और सत्य जानने के बाद राग या विराग जैसै कोई भी भाव नहीं बचता । क्यूँकि अनुभवकर्ता निर्गुण है, जब अनुभवकर्ता लीला करने के लिए एक जीव बनकर मिथ्यारुपमें प्रकट होता है तो वो जीना भी नहीं छोड सकता । जीनेके लिए जो अति आवश्यक है वो तो होना ही है, और अपने आप हो जाएगा । आध्यात्मिक प्रगति के लिए चेतना में रहना आवश्यक है लेकिन वो भी कोई प्रयास से नहीं होता है, अपने आप प्राकृतिक रुपसे ही होता है । वैरागी सभी वृत्तियों को सरलता से स्विकार भाव से लेता है, आए या जाए पूरा हो या न हो वैरागी को कोई फर्क नहीं पडता । यदि कोई गलत कर्म होनेवाला है तो वैरागी उसको रोक लेता है । बुद्धि और चेतना का प्रयोग करता है । वैराग्य के साथ साथ चेतना भी सुदृढ और स्थापित होता है ।
वैराग्य भाव आध्यात्मिक यात्रा तर्फ का संकेत भी है । आध्यात्मिक क्षेत्रमें ये शब्द अधिक प्रयोग होता है और आवश्यक भी है, लेकिन सांसारिक सफलता के लिए भी ये भाव उतना ही उपयोगी है । क्यूँकि ये भाव से इच्छा, वासना कम होतें है । काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे दुर्गुण कम होतें है । आसक्ति कम होता है, प्रतिस्पर्धा कम होता है । ज्ञान बढ जाता है ज्ञान से सभी एक ही रुप जानकर स्विकार भाव, सम भाव और सन्तोष भाव में रहा जा सकता है, इसी में सुख, शान्ति एवं आनन्द है ।
सांसारिक विषयों से अनासक्त होने से ही साधक आत्म केन्द्रित हो सकता है । यही आत्मज्ञान और साक्षी भाव के सफलता के कड़ी है । यदि व्यक्ति विषय-वासना में लिप्त रहता है तो वो सांसारिकता में ही रमने लगेगा, और अनेक कर्म बन्धनों में फसता चला जाएगा । अत्याधिक राग हर क्षेत्र में बाधक है । राग व्यक्तिको उस विषय पर लिप्त रखता है । मनुष्यका लक्ष्य मुक्ति है । जो विषयों पर चिपकता है उसको मुक्ति मिलना कठिन है । मुक्ति के लिए त्याग और वैराग्य आवश्यक है । अनासक्ति से त्याग, त्याग से वैराग्य, वैराग्य से मुक्ति मिलेगी और मुक्ति में ही परमानंद है ।
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