ज्ञान
स्मृति में अनुभवों का व्यवस्थित संयोजन ही ज्ञान हैं l ज्ञान वृत्ति के रूप में चलता है और स्मृति में एक वृत्ति युक्त संरचना बनाकर रहता है l स्मृति में नाम-रूप, कर्ता-कर्म, कारण-प्रभाव, विषय-वस्तु, अनुभवों के वर्गीकरण, ज्ञान के सार, परिकल्पना, विवेक, अनुभवों का पदानुक्रम आदि के आधार में ज्ञानका संयोजन होता है, और क्रमश: परिस्कृत एवं संगठित होता जाता है ।
ज्ञान दो प्रकार के होते हैं l सकारात्मक - अनुभवों को और उनके गुणों को सकारात्मक रूप में वर्णन किए जानेवाला ज्ञान सकारात्मक ज्ञान है l इसमें अनुभवों को स्वीकारा जाता है l नकारात्मक - अनुभवों को नकारात्मक रूप में उल्लेख किए जाने वाला ज्ञान नकारात्मक प्रकार में आते हैं l ज्ञानमार्ग में अज्ञान का नाश करने के लिए नकारात्मक ज्ञान अधिक उपयोग किया जाता है l
परिकल्पना के आधार में भी अनुभवका ज्ञान होता है । अनुभवों से सीधे प्रयोग ना होने वाला ज्ञान के विषय में सान्दर्भिक धारणा बनाकर परिकल्पना किया जाता है l परिकल्पना ज्ञान को प्रयोग करने में सहायक होता है l जो अज्ञात है उस चीज को जानने के लिए वैज्ञानिक विधि के माध्यम से सिद्धांत निर्माण करके उपयोग में लाया जाता है l इस प्रयोग से ज्ञान का तलाश होता है और इसका नतीजा मनुष्य के सुखद जीवन के लिए उपयोग किया जाता है l काल्पनिक होते हुए भी माया को जानने के लिए परिकल्पना का उपयोग किया जाता है । इसीलिए परिकल्पना को भी ज्ञान माना जा सकता है । परिकल्पना को प्रयोग द्वारा सिद्ध करके सिद्धांत बनते है l ऐसा परिकल्पना कभी भी बदला जा सकता है, इसीलिए सिद्धांत सत्य नहीं होता l प्रयोग के द्वारा सिद्ध हुए परिकल्पना, धारणा और सिद्धांत आदि जब तक मिथ्या प्रमाणित नहीं होते तब तक प्रयोगमें आते है और जिस सिद्धान्त द्वारा मिथ्या सिद्ध होता है उसने पुराने सिद्धान्तको विस्थापित करता है । विज्ञान में अज्ञात अनुभव के बारे में अनुमान लगाकर सिद्धांत निर्माण किया जाता है और सिद्धांत के माध्यम से अस्तित्व के बारे में अध्ययन किया जाता है l
सभी जीव को जीने के लिए ज्ञान आवश्यक एवं उपयोगी है । जीव विकासक्रम के आधारमें ज्ञान का स्तर बढता जाता है । उत्तरजीविताके लिए आवश्यक न्यूनतम ज्ञान यानी कि रक्षण, भक्षण और प्रजनन का ज्ञान सभी जीव को होता है । मनुष्य में ज्ञानका स्तर उन्तन है । ज्ञान से ही मनुष्यका उत्तरजीविता और मुक्तिका मार्ग सरल है l व्यवस्थित खानपान, संचार, प्रजनन आदि प्रक्रिया के लिए ज्ञान उपयोगी है l स्वयं ज्ञान के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए भी ज्ञान ही आवश्यक होता है l ज्ञान अनुभवों का संग्रह मात्र नहीं है, वृत्ति के रूप में चलता है और स्मृति में आधारित होता है l तार्किक, सुसंगत होता है और पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है l
जो अनुभव होता है वह जाना भी जा सकता है अर्थात ज्ञान योग्य है l ज्ञान के माध्याम से अनुभवों को तीन तरह से व्यक्त किया जाता है: ज्ञात - जिस अनुभव के बारेमें स्मृति में तार्किक संबंध बनाता है वो ज्ञात अनुभव के श्रेणी में आता है । अज्ञात: अभी तक अनुभव नहीं हुए पर किसी माध्यम से अनुभव होने के सम्भावना जिसमें है उसकोअज्ञात के श्रेणी में रखा जाता है l अज्ञेय: वर्तमान ज्ञान के सीमा से परे जो है, जिसको जानना संभव नहीं है, वो अज्ञेय के श्रेणी में आ जाता है l
ज्ञान का साधन दो प्रकार के होते हैं l १) मान्य साधन : मान्य साधन भरोसा करने योग्य होता है और प्रभावी भी होते हैं l मान्य साधन से पर्याप्त और निर्विवाद ज्ञान प्राप्त होता है l २) अमान्य साधन : अमान्य साधन अति कम प्रभावी होता है और भरोसा करने लायक नहीं होता है l अमान्य साधन से प्राप्त हुआ ज्ञान संदिग्ध और असंगत होता है l इस प्रकार के ज्ञान से धोखा और भ्रम सिर्जना होता है l
ज्ञानमार्ग पर मान्य साधन को ही ज्ञान के लिए महत्व दिया जाता है l मान्य साधन भी दो प्रकार के है- १) अपरोक्ष अनुभव: अपरोक्ष अनुभव स्वयं का अनुभव होता है, जो भौतिक, अभौतिक माध्यम और उपकरणों के माध्यम से वर्तमान जागृत अवस्था में इंद्रियों मार्फत आता है l २) तर्क: व्यक्ति का वह बौद्धिक और मानसिक क्षमता है, जिससे अनुभवओं को सही अनुमान लगाकर ज्ञान अर्जन होता है l तर्क से सत्य- असत्य, सही -गलत, नैतिक -अनैतिक आदि का भेद पहचान होता है l तर्क ठोस और अपरोक्ष अनुभव में आधारित होना चाहिए l अपरोक्ष अनुभवों के साथ तर्क का प्रयोग करके प्राप्त हुआ ज्ञान प्रमाण या साक्ष्य के रूप में होता है l
ज्ञान के अमान्य साधन विभिन्न है l प्रमुख अमान्य साधनओं के उदाहरण इस प्रकार है :
पारंपरिक और सांस्कृतिक साधन: मान्यता, धारणा, भ्रम, सर्वमान्य सूचना प्राचीन ज्ञान, परंपरा, मिथ्यारोपण, मातारोपण l
व्यक्ति: माता-पिता, संबंधी, मित्र, नेता, विशेषज्ञ, बड़ा अधिकारी l
संस्था: विद्यालय, महाविद्यालय, संस्थान, कंपनी l
संचार माध्यम और पाठ्य सामग्री: पुस्तकें, समाचार पत्र, टीवी, इंटरनेट आदि l
अधिकांश सूचना अनुभव में आधारित नहीं होते, मनगढ़ंत और निराधार होते हैं l अपरोक्ष अनुभव में आधारित न होनेवाले सूचना को निराधार सूचना कहा जाता है l ज्ञान के भंडार में सूचना का डंगूर विकार के रूप में रहते हैं l अनावश्यक और निराधार सूचना के कारण मन में भ्रम सिर्जना होता है, बुद्धि मंद होता है, व्यक्ति में अभिमान और झूठे दंभ सिर्जना होता है l मूर्खता भर जाता है और जीवन लक्ष्य हीन और कष्टकर होता है l समाज में राग,द्वैस, हिंसा, अज्ञान, क्लेस, दासता बढ़ता है l इससे समाज अधोगति और दुर्गति के तरफ अग्रसर होता है l सूचना ज्ञान का एक संकेत और छोटा सा माध्यम मात्र है l सूचना मात्र से अपरोक्ष अनुभव नहीं होता l ज्ञान के बिना सूचना का कोई अर्थ नहीं होता है l सूचना असत्य, गलत, भ्रामक, और छद्म भी हो सकता है l इसीलिए इसको अज्ञान का स्रोत भी कहा जाता है l सूचना ग्रंथ और संचार माध्यम से आता है l सूचना प्रयोग में भाषा और बौद्धिकता का जरूरत पड़ता है l सूचना को ज्ञान में बदलने के लिए अपरोक्ष अनुभव से प्रयोग में लाना पड़ता है l इसीलिए ज्ञानमार्ग में ज्ञान के लिए अपरोक्ष अनुभव और तर्क को ही ज्ञान साधन के रुपमें मान्याता दिया गया है ।
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