शुन्यता

 शुन्यता 


शुन्यता अस्तित्व का तत्व है । शुन्यमें ही अनन्त सम्भावना निहित है । सभी कुछ सत्य-असत्य अनुभव शुन्य से ही प्रकट होता है । शुन्यता ही सम्पूर्णता है । 


अनुभवकर्ता तो शुन्य है ही, सभी प्रकट अस्तित्व के तत्व का खोज करने से केवल शुन्यता ही रह जाता है । जो भी शरीर, मन और जगत का अनुभव हमे प्रतीत होते हैं, वो केवल विश्वस्मृति का प्रक्षेपण मात्र है । इसीलिए हम कह सकतें है कि अस्तित्व शुन्य ही है ।


शुन्यता होनेका कोई प्रकिया या विधि नहीं है । ये केवल होना पन है, जो है सो है, वो शुन्य है । खाली में ही कुछ भर सकता है, या उभर भी सकता है । इसीलिए अनन्त अनुभव यहीं से स्वत: प्रकट होते हैं । शुन्यता स्वयम्भू है, स्वयं सिद्ध है । 


शुन्यता यहीं है । जो भी है वो शुन्यता में ही है । जहां खाली है वही संभावना होता है । शुन्य में भाव भी है, अभाव भी है । साकार भी शुन्य से ही है, और निराकार भी शुन्य से ही है । अर्थ भी शुन्य में है, अनर्थ भी यहीं है । खाली होते हुए भी भरा है शुन्य होते हुए भी सम्पूर्ण है ।


शुन्य ही नित्य है, अनादि और अनन्त है, और अभी है । शुन्यता समय और स्थान पर नहीं बल्की समय और स्थान शुन्यता में है । शुन्यता का कोई गणना नहीं है । शुन्यता अखण्ड है । एक ही हैं फिर भी अनेक है, अनगिनत भी है । 


सकारात्मक भी शुन्य है, और नकारात्मक भी शुन्य है । होना भी शुन्य है, और न होना भी शुन्य है । शुन्यता ही निर्गुण है, इसी में पू्र्णता है । शास्वत सत्य है, क्यूँकि यहि अनुभवकर्ता और अनुभव का तत्व है । इसको बुद्धिके सीमा से परिभाषित नहीं किया जा सकता, ज्ञान से नहीं जाना जा सकता, शुन्यता अज्ञेय है ।


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