ब्रम्हज्ञान
“सत्य एक ही है, अनुभव और अनुभवकर्ता दो नहीं एक ही है, अनुभव मिथ्या और अनुभवकर्ता सत्य है, तत्व और छायाँ के रुपमें है, यही सम्पूर्ण अस्तित्व है’ यही ज्ञान ब्रम्हज्ञान है । ये ज्ञान का अवस्था चित्त से परे का अवस्था हैं । इस अवस्था में कोई विशेष प्रकार के अनुभव नहीं होता । मेरा तत्व का खोज करने के लिए नेती नेती विधिके द्वारा अज्ञान और मान्यताओं को हटाटे-हटाते अन्त्य में मैं अनुभव और अनुभवकर्ता हूँ, मैं एक सम्पूर्ण अस्तित्व हूँ मैं ही ब्राह्म हूँ, ये बोध होता है । सारे अनुभव और अनुभवकर्ता को एक ही तत्व में पाया जाता है । यही सत्य है, नित्य हैं, निरंतर है, और केबल है । यही होना पन का बोध ब्रम्हज्ञान है, यही सहज समाधि का अवस्था भी है । अनुभव और अनुभवकर्ता कि विलय का अवस्था है ।
सत्य का ज्ञान तो सम्भव नहीं है । अज्ञेय है, फिर भी अज्ञान को हटाकर सत्य तक पहूँचने का प्रयास किया जा सकता है । आत्मज्ञान में मेरा त्तत्व तक पहुँचा जाता है । अनुभव और अनुभवकर्ता का भेद और मेल समझा जाता है, इसके लिए अलग करके देखना पडता है, परन्तु है तो ये एक ही । अनुभव और अनुभवकर्ता एक कैसे है ? कब और कैसे विलय होते है ? ये जाना तो नहीं जा सकता लेकिन उस स्तर तक पहूचने के लिए अपरोक्ष अनुभव और तर्क द्वारा प्रमाण संकलन करने का प्रयास किया जाता है । ब्रम्ह को जानने के लिए अनुभव और अनुभवकर्ता को अलग अलग करके देखना पड़ता है, एक का ज्ञान संभव नहीं है । अलग करके छोडने से भी अस्तित्वका लयबद्धता का पता नही चलता । जो अनुभवक्रिया के द्वरा अस्तित्व विद्यमान है उस स्तर तक पहुँचने के लिए ब्रम्हज्ञान आवश्यक है ।
ब्रम्ह यानी कि अद्वैत का ज्ञान संभव नहीं है, परंतु नकारात्मक ज्ञान और मान्यताओं का खण्डन संभव है । अज्ञान हटानेका दो तरीक़ा है, पहला अपरोक्ष अनुभव और दूसरा तर्क । नेति नेति विधि द्वारा आत्मज्ञान होने के बाद ब्रह्मज्ञान के द्वारा अद्वैत के स्तर तक पहुँचा जा सकता है ।
सभी अनुभव अनुभवकर्ता का ही छायां रूप है । अनुभव के माध्यम से ही अनुभवकर्ता को जाना जाता है, स्वयं का तत्व सत्य और मिथ्या का पता चलता है । सत्य और मिथ्या भी अलग तो नहीं तत्व और छाया रुपमे एक है लेकिन एक है कैसे ? इसका खोज चलता है । अनुभव मिथ्या है, मैं सत्य हूँ, मैं अनुभवकर्ता ने अपने ही छाया स्वरूप का अनुभव कर रहा हूँ, ये जो अवस्था पहले से है वो जाना जाता है । द्वैध में देखा जाए तो अनुभव और मैं दो है, अद्वैत में देखा जाए तो केवल एक ही है, मैं ही हूँ, और ये अनुभवक्रिया के द्वारा नित्य निरंतर चल रहा है । दोनाों एक ही है, लेकिन तत्व स्थाई है । अनुभव छाया स्वरूप है, मिथ्या और परिवर्तनशील है । अनुभव और तत्व स्वरूप में अलग होकर अनुभवक्रिया से जुड़े हुए हैं ब्रम्ह स्वरूप में । चित्त की क्षमता द्वैत का स्तर तक ही है । ब्रम्हज्ञान के लिए चित्त ने अनुभवकर्ता और अनुभव को विभाजन करके देखता है । प्रमाण संकलन करनेके लिए द्वैत का सहारा ही लेना पडता है । जब प्रमाण मिलता है, तब ये ज्ञान होता है कि एक ही अवस्था है, और वो है ब्रम्ह अवस्था । सुक्ष्मतम से लेकर स्थूलतम तक चाहे जो भी अनुभव हो उसको अनुभवकर्ता से अलग करके देखना सम्भव ही नहीं । यही एक ब्रम्ह होने का प्रमाण है ।
सत्य और मिथ्या के रूप में अनुभव और अनुभवकर्ता सदा एक साथ है, तत्व और छाया के रूप में । इन का भेद करना संभव नहीं है, केबल समझने के लिए अलग-अलग करके देखा जाता है । अनुभव और अनुभवकर्ता आपस में व्याप्त है, अविच्छिन्न है । यही सम्पूर्ण अस्तित्व है, यही ब्रम्ह है ।
ब्रम्ह अवस्था यानी कि अद्वैत में एक दो कर के गिनती नहीं होता है । अद्वैत का मतलब दो नहीं है लेकिन एक भी नहीं कहा जा सकता है । क्योंकि सत्य एक ही होता है, ब्रम्ह सत्य है । दो सत्य कभी नहीं होता, एक सत्य है तो दूसरा मिथ्या होना आवश्यक है । अनुभव और अनुभवकर्ता कि संयुक्त स्वरूप ही अस्तित्व है । यही एक परम सत्य हैं । अनुभवकर्ता के बिना अनुभव नहीं होता और अनुभव के बिना अनुभवकर्ता को नहीं जाना जा सकता है । अस्तित्व को स्वयं का ही मिथ्या रूप का अनुभव अनुभवक्रिया के द्वारा होता है । इस क्रिया में कोई समय और स्थान का भेद नहीं होता और अनुभव का बोध भी होता है । दोनों एकरुप में यही है और अभी है । जब अनुभव और अनुभव को जाननेवाला है, जाननेवाले के बिना अनुभव सम्भव नहीं है, तो यही अनुभवकर्ता का प्रमाण है । अनुभवकर्ता और अनुभव कभी अलग नहीं मिलते हमेशा एक साथ ही है ।
ब्रह्मज्ञान तक ही संपूर्ण ज्ञान है, मनुष्य के बुद्धि के सीमा में इसके आगे कोई भी ज्ञान सम्भव नहीं है । यहाँ पर सभी ज्ञान का अंत है । यही ब्रह्मज्ञान के बाद सभी साधना का भी अंत हो जाता है । सत्य की खोज का अंत हो जाता है । क्योंकि यहॉ से आगे जानने के लिए कुछ भी नहीं बचता है, आगे का विषय ज्ञान और बुद्धि के सीमा से परे हैं, अज्ञेय है ।
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