सुख
सुख चित्त निर्मित एक मिथ्या अनुभव है जो कर्म के प्रतिक्रिया स्वरूप शारीरिक और मानसिक आनन्द का क्षणिक तुष्टि दिलाता है, चित्त द्वारा कर्म के पुरस्कार के रुपमें मिलता है । दुःख का अभाव सुख है, लेकिन द्वैत में दुःख का अभाव सम्भव नहीं है, इसीलिए सुख माया है । सुख दुःख के परे जो मुक्ति है, वही परम आनंद वास्तविक सुख है ।
जीव हमेशा दुःख से मुक्ति पाना चाहता है, इसीलिए सुख चाहता है, लेकिन अज्ञान के कारण सत्य और मिथ्या को पहचान नहीं पाता । नैतिक, अनैतिक जो भी कर्म करके सुख ही पाना चाहता है । परन्तु अस्तित्व में केवल सुख ही नहीं, सिक्के के दूसरे भाग में दुःख भी है । दुःख है तब न सुख का महत्व पता चलता है । मिथ्या ही सही सुखद मिथ्या चाहता है, लेकिन सुख भ्रम है, क्षणिक है, परिवर्तनशील है, जैसे आता है, वैसे चला जाता है, क्यूँकि द्वैत में है और चक्रीय है । सुख दुःख का चक्र घुमता रहता है ।
मनुष्य ही नही हर जीव सुख में ही रहना चाहता है । केवल जीव ही नहीं प्रतिकूल और कष्ट कर परिस्थितियों में तो वनस्पति भी नहीं उगते । ये माया का स्वभाव है । सुख चित्त निर्मित अनुभव है, इसीलिए जिसका चित्त अज्ञान में ही फँसा है वो शारीरिक, मानसिक परिश्रम के बिना, दूसरों को दुख दे कर, नोकर बनाकर, छल कपट से, हिंसा अनैतिकता वेइमानी से, जैसे भी हो सुख ही भोगना चाहता है । जब उसका कर्मफल उसकी अपेक्षा अनुरूप आता है तब वो सुख का अनुभव करता है, परन्तु जिसने सत्य जान लिया वो सुख दुःख के खेल में मृगमरीचिका कि तरह भागता नहीं, जो उसका सत्य स्वरूप है, स्वभाव है, ज्ञानी हमेशा वो सुख दुःख के परे मुक्ति और आनन्द में रहता है।
जितना भी सुख मिले व्यक्ति को सन्तोष नहीं होता, क्यूँकि ये माया का स्वभाव ही है । जब रोज़ी रोटी नहीं होता तब रोज़ी रोटी में सुख है, जब वो मिला तब घर गाड़ी चाहिए, वो भी मिला तो और अधिक चाहिए और ये चाहत का सिलसिला कभी भी अन्त्य नहीं होता, तृप्त नहीं होता, क्यूँकि मनुष्य को जो चाहिए वो पहचाना ही नहीं है । हर चीज़ में, हर कर्म में, हर क्षण में सुख ही चाहता है, लेकिन सुख है तो माया, किसी चीज़ में नहीं मिलता, इसीलिए इधर उधर भटकता रहता है । सुख दुःख अस्तित्व के पूर्णता का भाग है । सुख माया के खेल का गोटी है, जाल है । मनुष्य इसी में फँसे रहना चाहता है । जीसने चाहत को पहचान पाया, तृप्ति किस चीज़ में है वो पहचान पाया, उसने जो भी है उसी में सर्वस्व पा लिया, वो पा लिया जिससे आगे पाने के लिए कुछ भी नहीं है । स्विकार भावमें रहना, विरक्त होना, आसक्ति का त्याग करना ही सुख है । सुख तो मुक्ति में है, जो सुख दुःख से परे है वही मुक्त है, वही सुखी है जो आनन्द में है ।
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