आत्मन
अस्तित्व यानि कि सम्पूर्णता का तत्व, मेरा स्वरूप ही आत्मन है, जिसको स्वयं का अनुभव होता है, इसीलिए वही अनुभवकर्ता है और आत्मन ही ब्रह्मन भी है । समय, स्थान, रूप, गुण, कारण~प्रभाव, मात्रा, परिमाण आदि से मुक्त है । आत्मन हर सीमाओं से परे हैं । कोई भी ज्ञान, शब्द, शास्त्र, सिद्धान्त, भाषा या नाम से आत्मन को परिभाषित नहीं किया जा सकता, अज्ञेय है ।
आत्मन नित्य, निरंतर है । आत्मन एक ही है, क्यूँकि सभि अनुभवका तत्व वही है । अखंड है, अक्षय है । जैसे सभी घटों में एक ही आकाश निहित होता है उसी तरह से सभी अनुभव (जीव, वस्तु, पराभौतिक परामानसिक) आत्मन यानि कि अनुभवकर्ता द्वारा ही प्रकाशित है । सभी मेरा (आत्मन) का ही रुप है । आत्मन कोई भी विधि से सिद्ध नहीं होता, वह स्वयं सिद्ध है, स्वयं परिभाषित है । नेति नेति विधि के द्वारा केवल अज्ञान को हटाया जा सकता है, नकारात्मक ज्ञान सम्भव है ।
आत्मन शाश्वत है बिना कारण है, बस है । कोई कारण और प्रभाव से आत्मन का प्रदुर्भाव नहीं हुआ है । यदि आत्मन पर कोई कारण और प्रभाव ढूँढा भी जाए तो वह अनुभव होगा । आत्मन का कोई साक्षी और प्रमाण नहीं है, स्वयं प्रकाशित है, हर विधि और प्रक्रिया से अलग है, स्वयंभू है । गिनती में आने वाला हर चीज़ अनुभव है । आत्मन कोई व्यक्ति, शरीर या ज़ीव आदि जैसे कोई भी अनुभव नहीं है बल्कि उन अनुभवको होनेका सार तत्व है ।
आत्मन सर्वव्यापी है । कोई भी स्थान, आयाम, क्षेत्र और सीमा से परे हैं, असीमित है । सभी स्थान, आकाश, पूर्णता, शून्यता आत्मन के भीतर ही समाता है, अनादि और अनंत है । समय स्थान आदि सभी अनुभवको आत्मन से अनुभव किया जाता है ।
आत्मन का तत्व शून्य है, स्वयं ही तत्व है, शाश्वत है, साक्षी और द्रष्टा है, सर्वव्यापी और एक है । आत्मन निर्गुण है । समझने के लिए प्रयोग में लाए गए सभी विशेषताएँ, विशेषण एवं गुण नकारात्मक है । आत्मन अजन्मा, अजर, अमर है । निराकार और पूर्ण है । शुद्ध, निर्मल और मुक्त है, सार्वभौमिक है । शान्त, प्रेम और आनन्द स्वरुप है । स्थायी, अपरिवर्तनीय और शास्वत है । यही एक मात्र सत्य है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें