भोग

 भोग


सामान्य अर्थ में जो भी कर्मका संकार जमा होता है और जो कर्मफल आता है, उसको जीवद्वारा अनुभव करना, उपयोग करना या उसे झेलना ही भोग है । भोग प्रकृतिका नियम है, जीव जो भी कर्म करता है, उसका फल उसे ही भोगना पडता है । क्यूँकि स्थूल या सुक्ष्म जो भी कर्म होतें हैं, वो सभी पराभौतिक परामानसिक स्मृति में छपते हैं । इच्छा, वासना और कर्म का मात्रा, तिव्रता एवं व्यग्रता के अनुसार प्रकृतिके नियमद्वारा उचित समय आने पर उसका फल आता है । भोगका परिमाण भी इसी अनुसार तय होता है ।


सामान्यत: कर्मफल भोग सभी का अपना-अपना ही होता है, दूसरों में बाँटा नहीं जा सकता, लेकिन विश्वस्मृति और जीवस्मृतिबीच कोई सीमा रेखा नहीं है । इसीलिए हमेशा साक्षी भाव में रहनेवाले ज्ञानी जनोंकेबीच अहमद्वारा सृजित सीमा रेखा मिट जाता है । एक दूसरेके कर्म और फलभोग को बाँट सकते हैं । इसके उदाहरणके रुपमें जो सिद्ध पुरुष हैं उन्हों ने दूसरोंका कर्मफल अपने उपर ले सकतें हैं, विमारी अपने उपर ले लेना, ठिक कर देना आदि । ये भी सवल ने निर्वलका भार उठाकर सहयोग करना जैसा ही है । सांसारिकता में कर्मफल भोग बाँटा नहीं जा सकता लेकिन सामिल हो कर सहानुभूति और समानुभूति प्रकट करके, दया-करुणा-प्रेम आदि भाव से दु:ख सुखमें साथ देकर सहज बना सकतें हैं । कहावत भी है “दु:ख बाँटने से आधा हो जाता है और खुशी बाँटने से दुगुना हो जाता है” । 


अच्छे कर्मका फल अच्छा और बुरे कर्ममा फल बुरा ही आता है, जीव ने उसीको भोग करता है । जब जीव ने कर्मफल भुगतना पडता है, उस भोगाइ में जो कर्म होतें हैं, उसी से अगला संकार बनता है, और वैसे ही फल मिलेगा । भोग करना, न करना जीवके बसमें नहीं है, उसके इच्छा से नहीं होगा, प्रकृति के नियम अनुसार होता है । फिर भी यदि जीव में ज्ञान और चेतना हो तो कर्म और भोग सुन्दर और सुखदायी बना सकता है । कुछ उपाय इस प्रकार हैं-

  • जो कर्मफल भोग है, आगामी संस्कार के लिए यही नया कार्य भी है । यदि ये चेतना में होता है तो बुरा नही होगा । 

  • चेतनायुक्त भोगमें न्यूनता आता है, इस से भी मुक्ति के यात्रा निकट होता है ।

  • कर्मबन्धन सृजना होने बाले कर्म और फल भोग कम करने से भी मुक्ति निकट होता है ।

  • दूसरों को भी स्वयं का ही रुप मानकर कर्म और भोग करने से सभीका उद्धार होता है ।

जीव जितना भोग विलास में लिप्त रह जाता है, उतना ही जीवनचक्र में फसता जाता है, मुक्तिका मार्ग लम्बा होता है । भोग भी कर्म ही है, कम भोग में कम संस्कार पडता है, कम कर्मफल और फिर से कम भोग होता है । ये प्रक्रिया चक्रीय रुपमें दोहोराता है, क्यूँकि नाद चक्रीय है, जीवन ही द्वैत में है । जैसा बीज लगाया वैसा ही पेड़ बनेगा और फल आएगा । इसीलिए भोगको अच्छा और नैतिक बनाते हुए कम से कम करने से शीघ्र कर्मबन्धन छुट जाता है और जल्दी मुक्ति मिलता है । 


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