स्मृति
नाद में से विशेष प्रकार के अर्धस्थायी नाद रचना ही स्मृति है । अस्तित्व में जो अनन्त सम्भावना है, उसी में नाद का परिकल्पना किया गया है, अर्थात ज्ञानमार्ग के अनुसार सभी प्रकट अस्तित्व नाद आधारित है । यही विशेष नाद रचना अनुनाद, प्रवर्तन आदि द्वारा अन्य नाद रचना का रूप भी ले सकता है । स्मृति में सारा अनुभव है, शरीर भी स्मृति में हैं । स्मृति निरंतर है, अखंड है । सभी स्मृतियों का योग ही विश्वस्मृति है । सारे नाद रचनाएँ विश्व स्मृति मैं संग्रहित होते हैं । जीव स्मृति विश्व स्मृति का छोटा भाग है । जागृत अवस्था में जीव ने स्मृति में संग्रहित नाद रचनाओं का जो उपयोग कर रहा है उसको जीव स्मृति कहते हैं । विश्वस्मृति के अनुभव जीव ने अपने आवश्यकता के अनुसार अपने स्मृति में संग्रहित करता है, प्रतिकृति बनाता रहता है । विश्व स्मृति के जानकारी जीव स्मृति तक, और जीव स्मृति के जानकारी इन्द्रियों ने ग्रहण कर के अनुभव होता है । जीवस्मृति और विश्वस्मृति के बीच में कोई दीवार नहीं है, क्योंकि स्मृति में कोई समय और स्थान नहीं है, पराभौतिक परामानसिक है ।
स्मृति विश्वचित्त का खेल मैदान है, मायाका लीला है, इसका ज्ञान सम्भव नहीं है । इसीलिए इसका कारण, प्रयाोजन या आवश्यकता ढूँढना व्यर्थ है । फिर भी सत्य तक पहूचने के लिए मनुष्य ने अपनी ज्ञान के सीमा में हर सम्भव प्रयास किया है । इसी से याहा पर कुछ प्रयोजन ढूँढने का प्रयास किया जाता हैः-
स्मृति के कारण उत्तरजीविता सम्भव हैः- नाद रचना स्मृति में निरन्तर छपता और संचय होता जाता है । नाद रचना स्मृति में संचय होने से स्थायित्व भ्रम पैदा होता है । इसी से जीवन सम्भव हुआ है ।
अर्धस्थायित्व के लिएः- स्मृति में छपा हुआ अर्थपूर्ण नादरचना का संचय ही संस्कार बनकर कर्मेन्द्रीय मार्फत कर्म में परिवर्तन होता है । स्मृति बिना कर्म संभव नहीं है ।
अनुभव होने के लिएः- नाद को इन्द्रियों ने ग्रहण करके स्मृति में भेज देते हैं, और स्मृति से अनुभव की रचना होती हैं । छोटा छोटा नाद स्मृति में संकलित होकर पूर्णता का अनुभव होता है । स्मृति बिना अनुभव संभव नहीं है ।
विश्वस्मृति सभी स्मृति का समूह है, और यही प्रकट अस्तित्व है । सभी रचनाएँ विश्वस्मृति का ही भाग है । भाग करना तो असंभव है, एक कहाँ से शुरू होता है और कहाँ ख़त्म होता है और दूसरा कहाँ से शुरू हो होता है, परंतु मिथ्या भाग कर सकते हैं । स्मृति के प्रकार:-
अव्यक्तिक क्षेत्र - कारण शरीर के क्षेत्र में अनेक कारण शरीर मिल के अव्यक्तिक क्षेत्र बनाते हैं । उनके बीच का कर्म बंधन के कारण ऐसा होता है ।
कारण शरीर - परत के ऊपरी क्षेत्रों में स्थित सूक्ष्म व्यक्तिक क्षेत्र कारण शरीर है । यह मृत्यु लोक की तरह नश्वर नहीं है, जल्दी नष्ट नहीं होते, यानी की अधिक स्थायी होते हैं ।
समूह स्मृति- सूक्ष्म लोक में अन्य अव्यक्तिक क्षेत्र मिल के समूह स्मृति बनता है । समूह स्मृति में कारण शरीर के अलावा नियमित लोक भी मिलते हैं जैसे कि पृथ्वी लोक ।
नियमित लोक - समूह स्मृति में नियमित लोक भी मिलता है । यहा पर अनुभव अर्थपूर्ण और नियमित होती हैं, जल्दी नहीं बदलती है । यह अनुभव कर के सीखने के लिए उपयोगी है, परंतु अधिक नश्वरता है, दुख है, पीड़ा है, बंधन है । जब तक सीखना है तब तक इन्हीं लोकों में अवतार लेना पड़ता है ।
अनियमित लोक - समूह स्मृति में अनियमित लोक भी पाए जाते हैं । स्वप्नलोक इसका उदाहरण है । यहाँ पर कोई नियम लागू नहीं होता, और कुछ भी प्रकट हो सकता है । मानसिक क्षमता बढ़ाना, तंत्र का प्रयोग करना, स्वयम् का अलग लोक निर्माण करना आदि इसकी उपयोगिता है । अनियमित क्षेत्र अधिक है, बड़ा है,
महास्मृति - अव्यक्तिक क्षेत्र, कारण शरीर, समूह स्मृति, नियमित और अनियमित लोक आदि मील के महास्मृति बनता है । यहाँ पर सारे लोक, सारे स्मृति,सारे जगत, सारे जीव आते हैं ।यहीं पर माया का सारा खेल चल रहा है । महास्मृति भी अनेक हो सकते हैं ।
विश्वस्मृति - अनेक महास्मृति मिल के विश्वस्मृति बनता है । सभी महास्मृति विश्व स्मृति में विलीन हो जाते हैं । विश्व स्मृति अस्तित्व का प्रकट रूप है ।
संभावित स्मृति - विश्व स्मृति के परे आस पास में सम्भावित स्मृति क्षेत्र है जहाँ पर अनेक संभावनाएं हैं, अभी तक प्राप्त नहीं हो पाए हैं। ये क्षेत्र अनंत है । विश्व स्मृति सम्भावित स्मृति क्षेत्र के छोटा सा भाग है ।
इन्द्रियां अपने परत से संबंधित विश्व स्मृति की छवि बनाते हैं, यही छवि लोक कहलाते हैं । कुछ परतों के समूह से संबंधित लोक होते हैं । इन लोकों के बीच में कोई सीमा नहीं होता, शरीर, इन्द्रिय लोक के आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते है ।
स्मृति क्या है और कैसे चलता है ये जानने के लिए विज्ञान का सहारा लेकर प्रतिरूप बनाके, परिकल्पना और सिद्धान्त निर्माण करके मायाका अध्ययन करने का प्रयास किया गया है । स्मृति में स्वयं को संगठन करने की क्षमता होती है, स्वयं संगठित होकर वृत्तिओँको जन्म देती है, यहीं से जीव का विकास होता है । रक्षण, भक्षण और प्रजनन का प्रक्रिया शुरू हो जाता है । सफल रचना वातावरण एवं आस पास के वृत्तिओँ से आपस में संबंध बना के जुड़ जाते हैं, अपने आप को परिस्थिति के अनुकूल बनाते हैं । इसको रक्षण कहा जाता है, जो नादरचना स्मृति में संगठित नहीं हो सकती उसको असफल संरचना मानते हैं । सभी परतों में प्रक्रिया, वृत्तियॉ, इंद्रियां होते हैं । संपर्क सेतु के माध्यम से जुट के नई वृत्तियॉ, संरचनाएँ बनते हैं । ये सब विश्व स्मृति में होता है । जब तक उत्तरजीविता के लिए अर्थपूर्ण होता रहता है तब तक फैलता रहेता है, और आवश्यकता के अनुसार विभक्त भी हो जाता है । विश्वस्मृति में अनुभव छपने के लिए चक्रीय प्रक्रिया, प्रतिकृति, स्वयोजनकारी, संगठनकारी, स्वसमान, बाध्यकारी, कलनीय, परिवर्तनकारी, सूचक, प्रेरक, अनुकरणीय, जटिल, यौगिक, विनाशकारी अदि प्रक्रिया चलकर स्मृति में छाप छोडते हैं और अनुभव होता है । स्मृति से अनुभव होने का कुछ प्रक्रिया इस प्रकार हैः-
स्मृति के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक संवेदन द्वारा नाद प्रसारित होता है । स्मृति में स्थित वस्तुएँ नाद प्रसारित करती रहती है, और इन्द्रियॉ नाद को पकड़ती रहती है । विश्व स्मृति के नाद को छान कर सीमित करके जीव स्मृति में भेजा जाता है । सभी दिशाओं में संवेदन नाद के द्वारा प्रसारित होता है, यही से जीव स्मृति ने पकड़ के अपने भीतर प्रसारित करता है।
नादरचनाएँ पराभौतिक परामानसिक होने के कारण यदि कभी संपूर्ण परतीय रचना नष्ट हो भी जाए तो विश्वस्मृति मे उसका जो छाप छूट जाता है, उसी से उसका वैसा ही पुनर्संरचना होता है । परतें बनना, परतों का मिश्रण या अलगाव विश्वस्मृति में चलने वाला प्रक्रिया है ।
आस पास के वातावरण का जानकारी विश्वस्मृति के स्तर के इन्द्रीयों ने विश्व स्मृति के लिए देते हैं । जो स्मृति में छापा है उसी का अनुभव होता है । उस स्मृति के छाप पुनः नाद में बदल सकता है, और इन्द्रियां द्वारा फिर से अनुभव किया जा सकता है । वही स्मृति फिर से नाद रूप में स्मृति में प्रकट हो सकता है ।
स्मृति में नाद रचनाओं का निकटतम सम्बंध बनता है, स्वयं संगठित होती हैं । सम्बंधित अन्य ज्ञान का भी संचय होता है । इस तरह से जीव, वस्तु, मन आदी सभी अनुभवका पूर्णता प्रतीत होता है । उस अनुभव के बारे में सारे अनुमान लगाया जा सकता है, व्याख्या किया जा सकता है ।
छोटे छोटे नाद रचना और संबंधित संपूर्ण घटनाओं के बीच स्मृति सेतु के माध्याम से सम्बंध और संपर्क बनता हैं, इस से ही जीवन के निरंतरता का भ्रम दिखता है । जैसे बचपन का स्मरण, निद्रा टूटने के बाद का स्मरण । इस प्रकार भिन्न अवस्थाओं पर भी स्मृति ने सेतु के मार्फ़त अनुभवों को निरंतरता देता है ।
एक नाद रचना के मिट जाने पर भी प्रतिकृति बनके फिर से स्मृति में छापता है, इस से भी स्मृति में स्थायित्व का भ्रम पैदा होता है ।
नाद रचना जो नियमित रूप में चक्र में चलती है, स्वयं को दोहराती रहती है यही प्रक्रिया नाद रचनाओं को सृजन, समायोजन और नियंत्रण करते हैं । कोई रचनाओं के प्रक्रिया धीमी चलती है और कोई रचनाओँ का प्रक्रिया जल्दी चलता है, इन्द्रियां ही पकड़ नहीं पाता । एक वस्तु में संरचना और प्रक्रिया दोनों होते हैं । जितने जटिल संरचना होती है उतना ही जटिल प्रक्रिया होता है । इस प्रकार स्मृति का यात्रा चलता है । अपने आप चलता है, नाद में गति है इसलिए चल रहा है । बिना कारण चलता है, अपने ही प्रक्रिया में चलता है । कारण, लक्ष्य, दिशा केवल प्रतीत होते हैं, क्योंकि नियमबद्ध होने का परिणाम है । सब वृत्त में चल रहा है क्योंकि नाद चक्रीय है ।
सभी भौतिक और मानसिक अनुभव का आधार स्मृति है, और स्मृति पराभौतिक परामानसिक है । नाद जब तक स्मृति में नहीं छपता तब तक भौतिक और मानसिक भेद नहीं किया जा सकता है । स्मृति स्वयं को स्थाई रखने का प्रयत्न करती है, दूसरे से प्रभावित होना नहीं चाहती । इसलिए स्मृति में एक जडत्व होता है, जिसने जल्दी परिवर्तन होने नहीं देता । स्मृतियॉ दो अवस्थाओं और दो जन्मों के बीच सेतु बनाते है लंबे समय तक चलते हैं । स्मृति केवल अस्तित्वका संभावना मात्र है इसलिए अनंत है, अनन्त सिर्जन संभव है और इसका पूरा ज्ञान भी सम्भव नहीं है ।
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