कला
कोई भी कार्य सुन्दर और आकर्षक ढंग से करने का सीप एवं कौशल को कला कहते हैं । जैसे बोलने, लिखने रचनात्मक कला । गाने, बजाने, नाचने आदी संगीत कला, पाककला, वास्तुकला, चित्रकला, अभिनय कला आदि आदि कला का उदाहरण है । १६ कला ६४ कला आदि भी बोली व्यवहार में प्रचलित हैं । कला प्रकृति का स्वभाव है, एक प्रकारका लीला भी है । कला का श्रोत नाद है, माया या विश्वस्मृति है । इसीलिए भक्ति मार्ग में विश्वस्मृतिको कलाधर कलानिधान या कलानिधि भी कहा जाता है । कला से ही अस्तित्व गतिमान है । वेद भी कलाका श्रोत हैं । जैसे कि साम वेदको संगितकला का श्रोत माना गया है ।
कला जीवन को सरस बनाने के लिए आवश्यक है । एक ही प्रकारके जीवन शैली में जीव का मानसिक स्वास्थ्य अच्छा नहीं होता है । सांसारिक गतिविधि निरस होता है । जीव मिथ्या होते हुए भी सुन्दर और सुखद मिथ्या चाहता है । इसीलिए जीवन के अधिकांश क्षेत्र में अनेक उपायों को खोज करके रुचिकर और मीठासपूर्ण बनाता है । जिसमें कलाकारिता का गुण है वो सांसारिक जीवन में तुलनात्मक रुपमें सुखी और ख़ुशी दिखता है, क्यूँकि उसको कैसे दुख और निरसता से मुक्त हुआ जा सकता है, कैसे कठिन परिस्थिति को भी मनोरंजक बनाया जा सकता है वो पता होता है । आध्यात्मिक प्रगति के लिए भी विरक्ति और स्विकार भाव के साथ कला का गुण होना उपयोगी होता है । श्रवण मनन निदिध्यासन का कला, चेतना और साक्षी भावका कला, विरक्त होने और आसक्ति छोडने का कला, मुक्ति का कला, दूसरोंको मुक्त करने के लिए बोलने लिखने और समझाने कि कला होना चाहिए ।
यदि सुक्ष्म रुपसे देखें तो सभी अनुभव में कलाकारिता का गुण है । पेड़ पौधे का झुलना, फुलना, फलना, सुगन्ध विखेरना, आदि कला ही है । जीवजन्तुका चालढाल, हवामें उड़ना, पानी में तैरना, हंस का चलना, साँप का चलना आदि गतिविधियाँ सुन्दर कलापूर्ण होता है । मनुष्य बुद्धिमान और सचेत जीव है इसीलिए हर गतिविधियों को सुखदायी एवं रुचिपूर्ण बनाना चाहता है । इन्हीं हवा, पानी, जीवजन्तु, वन, जंगल, फूल, पौधे आदि से मनुष्य ने कला सिखता है । हर गतिविधियों को विभिन्न आयामों से देखता है । सकारात्मक को और रोचक बनाता है । नकारात्मक और असत्य को भी उपयोगी बनाने का, विसत्य सावित करनेका क्षमता होता है । ये कला का ही गुण है ।
कला शब्द में अभिनय भी जुडा है । कला में कुछ प्रयोजन, विषय-वस्तु, कलाकार, लक्षित वर्ग आदि विभिन्न पक्ष होतें है । किस प्रयोजन और वर्ग के लिए कला के प्रदर्शन होने वाला है उस अनुसार विषयवस्तु और प्रदर्शन कौशल का उपयोग करना पडता है । मनोरंजन के लिए अवास्तविक, कपोलकल्पित, अयथार्थ भी प्रयोग हो सकता है । एक साधक नें ये बातको ध्यानमें रखते हुए वास्तविक एवं यथार्थपरक बनाना चाहिए । वैसे तो बनानेवाला कोई नहीं, जो होना है वो हो जाता है लेकिन चेतना के प्रकाश में देखने से ही उसमें नैतिक और उचित कलाकारिता भर जाता है । जिस उद्देश्य के लिए कलाका उपयोग किया गया है उसके अनुसार कलामा वास्तविकताका मात्रा होता है । यदि केवल मनोरंजन के लिए है तो हसीं मजाक भी जुडा जा सकता है । यदि जीवन शैली सुन्दर बनाने और आध्यात्मिक प्रगति के लिए हो तो कला स्वभाविक और मुक्ति के लिए सहायक होना चाहिए ।
मनुष्य जीवनचक्र के अनेक पड़ावों से गुजरता है । जिस पड़ाव पर है उस अनुरुप अलग-अलग कला उपयोगी होता है । यदि वालवालिका लक्षित हो तो काल्पनिक कथा, गीत संगित, चित्रकला आदि उपयोगी होता है । यदि सांसारिक स्तर पर है तो गाना बजाना, खानपान, पोशाक, सामाजिक संस्कार आदि से सम्वन्धित कला उपयोगी होता है । यदि आध्यात्मिक स्तर पर है तो चेतना, वैराग्य और मुक्ति का कला आवश्यक है ।
कला प्रकृति स्वयं है, स्वयं रचाती है और स्वयं दिखाती है । जीव इस कलाका केवल अभिनयकर्ता है । एक साधक जो अनुचित होने वाला है उसको रोकना, जो मुक्ति के सहायक है उसको बढ़ाना, प्रयोजन एवं स्तर के अनुरूप अभिनय करना, उसको चेतना में देखना और आनन्द लेना बस इतना ही कर सकता है ।
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