सन्तोष
वर्तमान अवस्था में अपने साथ जो भी साधन है, उन्हीं में तृप्त रहना, सुखदायक अवस्था में रहना, अधिक प्राप्ति के अपेक्षा न होना, और आनन्द में रहना ही सन्तोष है ।
हरेक जीव सुख और सन्तुष्टि में रहना चाहता है । अज्ञान के कारण सन्तोष के लिए क्या चाहिए ये पता नहीं है । मान, प्रतिष्ठा, श्रोत, साधन, धन सम्पत्ति, गहने, वस्तुएँ, भोजन, सगेसंबंधी, आदि अधिक से अधिक जमा करना चाहता है । लेकिन इन सभी चीजों से सन्तोष नहीं मिलता । क्यूँकि जो पाने का चाहत है, जिससे मनुष्यको सन्तुष्टि मिलता है उसको पहचान नही पाया है । सत्यको यानी कि अपने तत्वको जानने में ही वास्तविक सन्तुष्टि है ।
सन्तोष भाव व्यक्तिनिष्ठ विषय है । कोई व्यक्ति न्यूनतम प्राप्ति में भी सन्तुष्ट रहता है । कोई जितना भी मिले असन्तुष्ट ही रहता है । जिसमें लोभ लालच, ईर्ष्या, वासना, इच्छा अधिक होता है, उसको कम प्राप्ति में सन्तोष नहीं होता है । जितना जमा करता जाता है, उतना कर्मबन्धन और संस्कार पडता है और आवागमन के चक्र में फँसता चला जाता है, मुक्ति कठिन होता है ।
कोई भी व्यक्ति पद और प्रतिष्ठा मिलने पर सन्तुष्ट नहीं है । यदि एसा होता तो उच्च पदासीन लोग, राजनेता क्यूँ असन्तुष्ट रहते ? यदि धन सम्पत्ति से सन्तुष्टि मिलता तो विश्व के धनाढ्य व्यक्ति सन्तुष्ट रहे होते; ऐसा भी नहीं देखा गया है । यदि भोग विलास में सन्तुष्टि होता तो दुध से नहानेवाले, सैंकड़ों नोकरचाकर आगे पिछे लगानेवाले महाराजा महारानीयाँ भी सन्तुष्ट नहीं थे । सांसारिक और अज्ञानी लोगों में मै और मेरा भाव होता है । स्वयं और सम्बन्धी को ही खुश रखना चाहता है । इसीलिए उसका सोच विचार भी संकुचित होता है ।
असन्तुष्टि भाव का कुछ हानीयाँ
अज्ञान को हटाकर ज्ञान में रहना मुस्किल होता है; क्यूँकि मन सदैव बेचैन रहता है ।
काम, क्रोध, लोभ, मोह को बढ़ावा देता है ।
सांसारिकता में लिप्त रहता है; आसक्ति बढ जाता है ।
स्वार्थ, हिंसा, भ्रष्टाचार, दुराचार, अनैतिकता, आदि बढ़ जाता है ।
सन्तोष भाव बढाने के लिए कुछ उपाय इस प्रकार है
आज्ञान को हटाकर स्वयंका सत्य जानना और चेतना में रहना ।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य को त्याग करना । दया, करुणा, प्रेम, इमानदारिता, धैर्यता, विनम्रता, शिष्टता आदि गुणों को विकास करना ।
जो है उसमें तृप्त रहना, आसक्ति छोडना, विरक्त और स्विकार भाव में रहना ।
जो आगे है केवल उनको ही नहीं जो पिछे है उनको भी जीना है, ये भाव रखना सहयोगी होना, और सेवा भाव में रहना,
यदि पद, प्रतिष्ठा, धन सम्पत्ति, यशआराममें सन्तुष्टि था तो ज्ञानीजन और ऋषिमुनी जंगल और गुफाओं में आनन्दित क्यूँ होते ? उनको कोई दुख पीडा क्यूँ नहीं छुता ? सभी अज्ञानीओंको मुक्त करने के लिए प्रयासरत क्यूँ होते ? बुद्ध ने राजपाठ क्यूँ त्याग करते ? जिसमें आध्यात्मिक चेतना है उसमें सन्तोष भाव रहता है । जिसको जितना मिला है, वो उसका कर्मफल है और ये मुक्ति के लिए रचा गया लीला भी है । दूसरोंको पीडा में देखकर एक ज्ञानी ख़ुश नहीं रह सकता । क्यूँकि सभी रुप मेरा ही है । यदि सभी सुखी और मुक्त रहें तो ये मेरा ही सुख और मुक्ति है । सन्तुष्टि साधन में नहीं, ज्ञान में है । प्रप्ति में नहीं, त्याग में है ।
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